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स्वर्णिम विकास के इन्द्रधनुष दर्शा रहा है राजसमन्द

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राजसमन्द। प्रकृति और परिवेश की तमाम खूबियों, मन को सुकून देने वाली आबोहवा और विकास के तमाम आयामों से लेकर आधुनिक सरोकारों तक के मामले में आज का राजस्थान अपने आप में सतरंगी तरक्की का दिग्दर्शन करा रहा है।

राजस्थान का हर भूभाग अपने आप में ढेरों खासियतों से इतना अधिक भरा-पूरा है कि यहाँ प्रकृति अपने तमाम रूप-रंगों और विलक्षणताओं के साथ विद्यमान है।
राजस्थान प्रदेश में राजसमन्द झील के नाम पर स्थापित राजसमन्द जिला अपने भीतर इतनी अधिक खूबियों को समाहित किए हुए है कि जो इस भू भाग में आता है वह तन-मन के सुकून और दिमागी ताजगी के अनुभव के साथ ही इतना अधिक प्रफुल्लित हो उठता है कि बार-बार इस धरा की ओर आकर्षित होने का लोभ संवरित नहीं कर पाता। राजसमन्द के अनुपम सौन्दर्य और लोक लहरियों के आनन्द को वही जान सकता है जो यहाँ की आबोहवा में विचरण या निवास कर चुका है।
झर रहे ऎतिहासिक गाथाओं के प्रपात
प्रातः स्मरणीय वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के शौर्य और पराक्रम की गाथाओं की गूंज से ओज-तेज से भरे-पूरे राजसमन्द की पहचान देश और दुनिया में है। ऎतिहासिक और पुरातात्ति्वक महत्व के प्राचीन दर्शनीय एवं पर्यटन स्थलों, नैसर्गिक रमणीयता से परिपूर्ण पहाड़ों, घने जंगलों और हरियाली का समन्दर दर्शाती यह धरा प्राचीन काल से आकर्षण का केन्द्र रही है।
सब कुछ है अभिराम
राजसमन्द झील के नाम से प्रसिद्ध राजसमन्द जिला अपने भीतर इतनी अधिक विलक्षणताओं से भरा है कि ऎसा और कोई क्षेत्र अन्यत्र नहीं है जो जन-मन को सभी प्रकार के आनंद और उल्लास से भरा रख सके।
धार्मिक आध्यात्मिक दृष्टि से राजसमन्द जिले में एक छोर पर प्रभु श्रीनाथजी का वैभव है तो दूसरी ओर श्रीचारभुजानाथ का श्रद्धा तीर्थ, कांकरोली में भगवान श्री द्वारिकाधीश बिराज रहे हैं और जिले भर में धर्मस्थलों की दीर्घ श्रृंखला आस्था और विश्वास का समन्दर उमड़ाती रही है।
लोक लहरियोें का आकर्षण
देश-विदेश के सैलानियों के लिए राजसमन्द का मनोरम परिवेश और यहाँ की परंपराएं बहुत अधिक लुभाने वाली हैं। शिल्प-स्थापत्य, धर्म-अध्यात्म की विशेषताओं को समेटने वाले राजसमन्द जिले की कला-संस्कृति, परम्पराएं और लोक लहरियाँ अन्यतम आकर्षण जगाने वाली रही हैं।
आध्यात्मिक विभूतियों, स्वतंत्रता सेनानियों और लोक सेवियों की इस पावन धरा का जर्रा-जर्रा माधुर्य, सौहार्द और उल्लास की अनुभूति कराने वाला है।
राजसमन्दवासियों की धड़कन राजसमन्द की झील व अभिराम नौचौकी की पाल का दिग्दर्शन और सामीप्य जमीं, आसमाँ और पानी तक से जुड़ी सभी आनंदधाराओं का ऎसा अनुभव कराता है कि जो एक बार यहाँ आता है वह बार-बार राजसमन्द की धरा पर आने को उत्सुक रहता है।
श्रद्धा, सौन्दर्य और नैसर्गिक रमणीयता की त्रिवेणी बहाने वाले राजसमन्द की बहुआयामी ख्याति को सुनने वालों के मन-मस्तिष्क में भी जिज्ञासाओं का ज्वार तब तक उमड़ता रहता है, जब तक कि एक बार साक्षात न कर लें।
हिलोरें ले रहा झील का उल्लास
राजसमन्द झील के प्रति जन-मन की अगाध आस्था और आत्मीयता का उमड़ता दरिया उस समय देखने को मिला जब 44 साल के बाद झील चरम यौवन पाकर छलक उठी। करीब माह भर तक राजसमन्द झील स्थानीय और देशी-विदेशी सैलानियों, झील और प्रकृति प्रेमियों का मन मोहती रही।
जिला बने अभी कुछ वर्ष ही हुए हैं लेकिन क्षेत्र के जन प्रतिनिधियों की आंचलिक विकास के प्रति सार्थक पहल और आत्मीय एवं समर्पित भागीदारी की वजह से राजसमन्द प्रदेश के विकासशील जिलों में अग्रिम पहचान बनाने लगा है और कई मायनों में विकसित क्षेत्र की ऊँचाइयां पा चुका है।
सुनहरा विकास परवान पर
बुनियादी सुविधाओं एवं सेवाओं की उपलब्धता के साथ ही विकास से जुड़े कई पहलुओं में राजसमन्द आज महानगरों की हौड़ करने लगा है।
दीर्घकालीन विकास की दृष्टि से रेल सुविधाओं में विस्तार के प्रयासों, स्टेट व नेशनल हाईवे, लोकोपयोगी संसाधनों की उपलब्धता आदि के साथ ही अनेक दूरगामी परिणाम देने वाली योजनाएं मूर्त रूप ले रही हैं। सरकार की सामुदायिक विकास तथा वैयक्तिक उत्थान की योजनाओं, कार्यक्रमों, अभियानों, परियोजनाओं आदि का ठोस क्रियान्वयन होने के साथ ही सामाजिक सरोकारों के निर्वहन में यह जिला आगे ही आगे रहा है।
गूंज रहे तरक्की के तराने
आम जन के उत्थान के लिए कई नवाचारों ने मूर्त रूप लेते हुए अपने उद्देश्यों में आशातीत सफलता हासिल की है। मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान, स्वच्छ भारत मिशन और इसी तरह की कई गतिविधियों ने लोक जीवन और परिवेश को नई व ताजगी भरी दिशा-दृष्टि प्रदान की है।
सुकून का अहसास
जन समस्याओं के त्वरित निस्तारण की पहल, मेलों, पर्वों, उत्सवों की परंपराओं के बेहतर निर्वहन, सरकार की फ्लेगशिप योजनाओं, मुख्यमंत्री बजट घोषणाओं से लेकर विभिन्न विभागों की गतिविधियों ने क्षेत्रीय विकास और जन कल्याण की भावनाओं को साकार करते हुए आम जन को सुकून का अहसास कराया है।
जन-जन की भागीदारी से राजसमन्द जिला आज निरन्तर विकास की डगर पर तेजी से बढ़ता हुआ अपनी खास पहचान कायम करता जा रहा है। आज का राजसमन्द न केवल राजस्थान बल्कि देश के तीव्र प्रगतिशील जिलों में शामिल हो चुका है।

 

 

– डॉ. दीपक आचार्य

सहायक निदेशक (सूचना एवं जनसम्पर्क )
राजसमन्द

 

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हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप राष्ट्रीय स्मारक की दुर्दशा पर जिम्मेदार हुए मौन !!

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विकास के नाम पर हुए भ्रष्टाचार की उच्च स्तरीय जाँच एजेंसी से जांच कराने की मांग

राजसमंद । राजसमंद जिला प्रशासन को धोखे में रख राष्ट्रीय स्मारक हल्दीघाटी व चेतक स्मारक के नजदीक सड़क पर बलीचा में घोड़े की मूर्ति लगाने के नाम पर सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने व कथित संग्रहालय नाम की दुकान के आगे आ रही पहाड़ी नष्ट करने की साजिश का मामला प्रकाश में आया हैं। पूर्व में सन २००७ की बैठकों में चेतक नाले पर बने व्यू पॉइंट पर घोड़े की मूर्ति लगाने की योजना थी।
जानकारी के अनुसार यह सोची समझी साजिश के तहत घोड़े का एकदिवसीय मेला कराने की आड़ में बेशकीमती भूमि पर अतिक्रमण का मामला है जिस पर प्रशासनिक सवा तीन लाख की अलग से स्वीकृति संदेह को गहरा करती है। उनवास ग्राम पंचायत के जनसेवकों का कहना है कि जिला प्रशासन को इसकी पूर्व में लिखित सूचना देकर किसी भी प्रकार के आवंटन पर रोक लगाने की मांग की गई थी। आराजी संख्या 924 चरागाह को बिलानाम करा कर पूर्व में भी इसी तरह अतिक्रमण कर ५ बीघा जमीन तो हड़पी जा चुकी है अब शेष रह गई जमीन पर पार्किंग बना कर राजस्व नुकसान सहित ऐतिहासिक प्राकृतिक धरोहर को नब्बे फीसदी नष्ट किया जा चुका है। हालात यह है कि बलीचा निवासी वर्तमान अतिकर्मी सेवानिवृत शिक्षक द्वारा हल्दीघाटी को अपनी निजी दुकान बना कर रख दी गई है। .. रक्त तलाई – शाहीबाग-हल्दीघाटी दर्रा – चेतक समाधी व स्मारक पर्यटकों के अभाव में सूने पड़े रहते व भ्रमित सूचनाओं के आधार पर पर्यटक सीधा बलीचा जाकर उसे ही हल्दीघाटी समझ 100 रुपया खर्च कर भी मूल धरोहरों को देखने से वंचित रह जाता है।



भ्रष्टाचार की भी कोई तो सीमा होगी ? देश के प्रधान सेवक की राष्ट्रभक्ति पर शक नहीं किया जा सकता तो क्या उनके अधीन आ रहे राजसमंद के सभी जन सेवक भी उसी ईमानदारी के साथ महाराणा प्रताप के स्थलों के साथ न्याय कर रहे है ? यह सोचनीय एवं गंभीर विषय है। अब पूंजीवाद के आगे आखिर कब तक नेता व अधिकारी अपनी आँख बंद कर महाराणा प्रताप राष्ट्रीय स्मारक हल्दीघाटी सहित समूची रणभूमि के बदहाल हालात देखते रहेंगे? राष्ट्रीय महत्व के स्मारक का शिलान्यास 1997 में होता है व महाराणा प्रताप की चेतक पर अश्वारूढ़ प्रतिमा २००९ में लगती है ! बावजूद इसके संरक्षण सभी जिम्मेदार अधिकारी व नेता न जाने कौनसी हिस्सेदारी निभाने के फेर में भ्रष्ट अतिकर्मी को सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने व सरकारी संग्रहालय को कागजों में दबा कर निजी दुकान की स्वीकृति दे देते है ? सत्य यह है कि २००७ में चेतक द्वारा लांघे गए ऐतिहासिक नाले पर पर्यटकों के लिए व्यू पॉइंट बनाने व यहाँ पर घोड़े की मूर्ति लगाने का प्रारूप रहा था ! अव्वल अधूरे स्मारक का उद्घाटन किया गया , सिर्फ इतना ही नहीं इसके सं्चालन की जिम्मेदारी जिला कलक्टर के अधीन १९९३ में बने कागजी महाराणा प्रताप स्मृति संस्थान को सौंपी गई। आखिर पूंजीवादी संस्थापक महासचिव श्रीमाली को यह बात कहाँ गले उतरने वाली थी। … उसके द्वारा सरकार को बौना साबित करने के चक्कर में कई हथकंडे अपनाये गए व आज पूरी पहाड़ी का प्राकृतिक स्वरुप ही नष्ट कर दिया गया हैं ! पर्यटकों को भ्रमित करने के लिए सड़कों पर बलीचा में चल रही निजी दुकान को संग्रहालय का नाम देकर देश के बड़े बड़े नेताओं सहित शीर्ष अधिकारियों इस कदर गुमराह किया हुआ कि पर्यटक हल्दीघाटी के नाम पर चल रही निजी दुकान में 100 रूपये देख मेवाड़ के महानायक वीर शिरोमणि महराणा प्रताप का नकली भाला व अन्य सामग्री देख ठगे जा रहे हैं
उदयपुर के पर्यटन विभाग ने तो जैसे समूची हल्दीघाटी पूर्व में आरटीडीसी चलाने वाले अतिकर्मी ठेकेदार को ही ठेके पर दे रखी हो ऐसा बर्ताव कर महाराणा प्रताप का दशकों से अपमान किया है। अब देखना यह है कि, कौनसा देशभक्त जनसेवक इस रणधरा की सुध लेकर भ्रष्ट पूंजीवादी ताकतों को संविधान के अनुसार न्याय दिलायेगा। स्थानीय हल्दीघाटी पर्यटन समिति के संस्थापक कमल मानव ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री ,गृहमंत्री , पर्यटन मंत्री सहित प्रदेश की मुख्यमंत्री से हल्दीघाटी के विकास एवं वर्तमान तक विकास के नाम पर हुए भ्रष्टाचार की जाँच करवाए जाने की सोशल मीडिया पर ट्वीट कर माँग की है।
उल्लेखनीय है कि स्थानीय उपखण्ड स्तरीय सतर्कता समिति में २००७ में भी अतिक्रमण की शिकायत पर अतिकर्मी मोहनलाल श्रीमाली को भविष्य में किसी भी प्रकार का कोई अतिक्रमण नहीं करने को पाबंद कराया गया था।


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राजसमन्द के आसमान में हवाई उड़ानों की तैयारी ~ केसुली की मोरजन पहाड़ी पर आरंभ होगा पैराग्लाइडिंग

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राजसमन्द। राजसमन्द के बाशिन्दों के लिए अप्रेल माह आसमानी उड़ान का सुकून लेकर आने वाला है जब राजसमन्द जिले में पैरा ग्लाइडिंग एवं सोलो फ्लाईट प्रशिक्षण की शुरूआत होने जा रही है। इसके लिए सभी जरूरी तैयारियां इन दिनों जारी हैं।

राजस्थान भर में यह अपनी तरह का पहला प्रशिक्षण होगा। इस तरह का प्रशिक्षण आरंभ करने वाला राजसमन्द राजस्थान का पहला जिला होगा। इससे राजसमन्द जिले में पर्यटन विकास के क्षेत्र में भी सुनहरा दौर आरंभ होगा। इसमें पैरा ग्लाइडिंग एवं सोलो फ्लाईट विशेषज्ञ पायलट कुं, अजितप्रताप सिंह प्रशिक्षण देंगे। इसमें 12 वर्ष से अधिक वर्ष आयु के स्वस्थ व्यक्ति प्रशिक्षण पा सकेंगे। इसके लिए नाथद्वारा तहसील अन्तर्गत केसुली गांव की मोरजन पहाड़ी और आस-पास का क्षेत्र हवाई उड़ान के लिए तकनीकि दृष्टि से उपयुक्त पाया गया है। प्रशिक्षण के लिए जिला कलक्टर श्रीमती अर्चना सिंह ने प्रशिक्षण संचालक पायलट कुं. अजितप्रताप सिंह को अनुमति जारी कर दी है।

पायलट कुंवर अजितप्रताप सिंह ने बताया कि पैराग्लाइडिंग के लिए पैराग्लाइडर, सेफ्टी बेल्ट, हेलमेट सहित सभी प्रकार के उपकरण प्रशिक्षण स्थल पर उपलब्ध हैं तथा परीक्षण के तौर पर इस समय पैराग्लाइडिंग जारी है।

उन्होंने बताया कि पैराग्लाइडिंग में रोजगार के व्यापक एवं सुनहरे अवसर हैं तथा हवाई उड़ान से संबंधित तमाम प्रकार के प्रशिक्षणों के लिए यह क्षेत्र सभी प्रकार की बाधाओं से रहित हैं। इससे राजसमन्द और आस-पास के इलाकों के युवाओं के लिए प्रशिक्षण की यह सुविधा उनके सुनहरे भविष्य के लिए बेहतर सिद्ध होगी।

कुं. अजितप्रतापसिंह ने बताया कि आमतौर पर पैराग्लाइडिंग का प्रशिक्षण चीन, नार्वे, ऑस्ट्रेलिया , कनाड़ा आदि कई देशों में उपलब्ध है लेकिन वहाँ की फीस बहुत ज्यादा है। सामान्य प्रशिक्षण कम से कम दस दिन का होगा। इस प्रशिक्षण के बाद युवाओं के लिए आकर्षक पैकेज में रोजगार के अवसर देश-विदेश में उपलब्ध हैं जिनका लाभ पाकर यहां के युवा आत्मनिर्भरता पा सकते है। इसी प्रकार सोलो फ्लाईट में अकेले आदमी हवाई उड़ान का लुत्फ लेता है। सोलो फ्लाईट का प्रशिक्षण पा लेने वालों के लिए टेन्डम (टू सीटर एयर टैक्सी) का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।

कुं. अजितप्रतापसिंह का सुझाव है कि केन्द्र और राज्य सरकार चाहे तो पैराग्लाइडिंग, सोलो फ्लाइट एवं टेन्डम को पर्यटन रोजगार से जोड़कर युवाओं को रोजगार की नवीन संभावनाओं से रूबरू कराकर आर्थिक विकास को नए आयाम दे सकती हैं।

उन्होेंने बताया कि ये सभी प्रकार के प्रशिक्षण इको फ्रैण्डली हैं और इसमें किसी भी प्रकार के प्रदूषण की कोई संभावना नहीं है। अप्रेल के प्रथम सप्ताह में इसकी शुरूआत की जाएगी।

केसुली गांव की मोरजन पहाड़ी पर परीक्षण के तौर पर चल रही पैराग्लाइडिंग ग्रामीणों के आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है।

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नमामि गंगे कार्यक्रम के शीघ्र कार्यान्वयन के लिए 19 अरब रुपये लागत की परियोजनाओं को मंजूरी

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उत्‍तराखंड, बिहार, झारखंड और दिल्‍ली में शुरू होंगी 20 परियोजनाएं

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) की कार्यकारी समिति ने गंगा को स्वच्छ बनाने के अभियान में तेजी लाने के लिए करीब 19 अरब रुपये लागत वाली परियोजनाओं को मंजूरी प्रदान कर दी है। कार्यकारी समिति की 02 मार्च, 2017 को हुई बैठक में मंजूर की गई 20 परियोजनाओं में से 13 उत्तराखंड से सम्बद्ध है जिनमें नए मलजल उपचार संयंत्रों की स्थापना, मौजूदा सीवर उपचार संयंत्रों का उन्नयन और हरिद्वार में मलजल नेटवर्क कायम करने जैसे कार्य शामिल हैं। इन सभी पर करीब 415 करोड़ रुपये की लागत आएगी। हरिद्वार देश के सर्वाधिक पवित्र शहरों में से एक है, जहाँ हर वर्ष लाखों श्रद्धालु आते हैं। अनुमोदित योजना का लक्ष्य न केवल शहर के 1.5 लाख स्थानीय निवासियों द्वारा, बल्कि विभिन्न प्रयोजनों के लिए इस पवित्र स्थान की यात्रा करने वाले लोगों द्वारा उत्सर्जित मलजल का उपचार भी करना है। इन सभी परियोजनाओँ के लिए केंद्र सरकार द्वारा पूर्ण वित्त पोषण किया जाएगा। यहाँ तक कि इन परियोजनाओं के प्रचालन और रख-रखाव का खर्च भी केंद्र सरकार वहन करेगी।

उत्तराखंड में अनुमोदित अन्य परियोजनाओं में से चार परियोजनाएं अलकनंदा नदी का प्रदूषण दूर करने से संबंधित है, ताकि नीचे की तरफ नदी की धार का स्वच्छतर प्रवाह सुनिश्चित किया जा सके।  इसमें गंदे पानी के नालों को नदी में जाने से रोकने के लिए उनका मार्ग बदलना, बीच मार्ग में अवरोधक संयंत्र लगाना और साथ ही चार महत्वपूर्ण स्थानों – जोशीमठ, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग और कीर्तिनगर में नए लघु एसटीपीज़ लगाना शामिल है, जिन पर करीब 78 करोड़ रूपये की लागत आएगी। इनके अलावा गंगा का प्रदूषण दूर करने के लिए ऋषिकेश में 158 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली एक बड़ी परियोजना का अनुमोदन किया गया है। गंगा जैसे ही पर्वत से उतरकर मैदानी भाग में प्रवेश करती है, तो वहीं ऋषिकेश से नगरीय प्रदूषक गंगा में मिलने शुरू हो जाते हैं। गंगा को इन प्रदूषकों से छुटकारा दिलाने के लिए ऋषिकेश में यह सर्व-समावेशी परियोजना शुरू करने को हरी झंडी दिखाई गयी है। इससे न केवल सभी शहरी नालों को ऋषिकेश में गंगा में जाने से रोका जा सकेगा बल्कि उत्सर्जित जल को उपचार के जरिए फिर से इस्तेमाल योग्य भी बनाया जाएगा। ऋषिकेश संबंधी इस विशेष परियोजना में लक्कड़घाट पर 26 एमएलडी क्षमता के नये एसटीपी का निर्माण किया जाएगा जिसके लिए ऑनलाइन निगरानी प्रणाली की भी व्यवस्था है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्‍ली में 665 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से उत्कृष्ट प्रदूषक मानकों के साथ 564 एमएलडी क्षमता के अत्याधुनिक ओखला मलजल उपचार संयंत्र के निर्माण की परियोजना भी अनुमोदित की गयी है। यह संयंत्र मौजूदा एसटीपी फेज़- I, II, III और IV का स्थान लेगा। इसके अलावा पीतमपुरा और कोंडली में 100 करोड़ रुपये से अधिक अनुमानित लागत वाली नई मलजल पाइपलाइनें बिछाने की दो परियोजनाएं भी मंजूर की गयी है, ताकि रिसाव रोका जा सके।

पटना में कर्मालिचक और झारखंड में राजमहल में 335 करोड़ रुपये से अधिक लागत से मलजल निकासी संबंधी कार्यों का भी कार्य समिति की बैठक में अनुमोदन किया गया। वाराणसी में, जहां वर्ष भर लाखों तीर्थ यात्री आते हैं, गंगा के प्रदूषण की समस्या का समाधान करने के लिए सार्वजनिक-निजी-भागीदारी यानी पीपीपी मॉडल वाली 151 करोड़ रुपये की परियोजना का भी कार्यकारिणी की बैठक में अनुमोदन किया गया।

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गोरमघाट क्षेत्र में बनेगा गोलाई नाका – पर्यटन परिपथ से जोड़ा जाएगा गोरमघाट व मण्डावर केरूण्डा

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राजसमंद। राजसमंद व पाली जिले की सीमा पर मारवाड़ की ओर व्यर्थ बहकर जाने वाले पानी को रोककर काछबली- मण्डावर ग्राम पंचायतों को स्थाई पेयजल समस्या समाधान व सिंचाई परियोजना हेतु गोरमघाट व गोरम थड़ा के बीच प्रस्तावित गोलाई नाका बनाकर लाभ दिया जायेगा। इस हेतु विधायक हरिसिंह रावत के प्रतिनिधि भीम भाजपा मंडल अध्यक्ष राजेंद्र सिंह रावत, उपाध्यक्ष फतह सिंह, जिला परिषद सदस्य हीरा कंवर चौहान व मण्डावर सरपंच प्यारी रावत के नेतृत्व में क्षेत्र का मौका मुआवना किया और जलग्रहण, पानी की आवक, स्टोरेज, पेयजल टंकी, सिचाई हेतु नहर आदि के बारे में विस्तृत खाका तैयार किया। साथ ही काछबली मण्डावर के गोरमघाट, नाहजी महाराज, केरूण्डा की नाल, जोग मंडी, वायड, काजलवास का पर्यटन परिपथ बनाकर विश्व पटल पर उभारने की योजना पर भी चर्चा की गई, रोप वे की योजना बनाई गई।

इस अवसर पर नेमीचन्द ताल, सूबेदार दिलीप सिंह कालिकाकर, मगरा सेना प्रमुख नारायण सिंह काछबली, संयोजक रणजीत सिंह सोलिखेड़ा, मगरा विकास मंच अध्यक्ष जसवंत सिंह मण्डावर, चन्द्रकान्त , ईश्वर सिंह, महेंद्र सिंह, कान सिंह, भूर सिंह, राजू सिंह पायरी, फुंदी देवी , पानी देवी, टमु देवी आदि मौजूद थे।







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