बाल संसद में कही बच्चों ने मन की बात – लोगों के दिमाग से मिटाना होगा आतंकवादी सोच

राजसमन्द।अणुविभा में चल रहे बालोदय शिविर में बच्चों ने देश में चल रही वर्तमान स्थिति और भारत पाकिस्तान के बीच मंडरा रहे युद्ध के खतरे पर खुलकर अपने विचार रखे। कुछ बच्चे जहां युद्ध के पक्ष में थे वहीं अधिकांश बच्चों की राय थी की युद्ध को अंतिम हथियार के रूप में ही प्रयोग करना चाहिए। बच्चों की संसद में बच्चों ने स्वयं अपना अध्यक्ष चुना एवं चर्चा का विषय भी चुना। चर्चा का विषय था क्या युद्ध समस्या का समाधान है? कुछ बच्चों ने जोशीली कविता के साथ अपनी बात रखी वहीं एक बच्चे ने अंतिम क्षणों में अध्यक्ष महोदय से पुनः समय मांगते हुए जो बात कही उसने चर्चा का रुख बदल दिया एवं पूरा सदन तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। बच्चे ने कहा – आतंकवाद किसी व्यक्ति अथवा समाज में नहीं होता बल्कि कुछ लोगों के दिमाग में होता हैै। जब तक हम उनके दिमाग से आतंकवाद का सफाया नहीं करेंगे, समस्या का समाधान नहीं हो सकता। स्व प्रेरित होकर रखे गए ये विचार सबको प्रभावित कर गए एवं सदन में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया गया कि जब सब रास्ते बंद हो जाए तभी युद्ध की बात सोचनी चाहिए और शांति के प्रयास जारी रखने चाहिए। और यदि युद्ध हम पर थोपा जाये तो उसके लिए हमारी सेनाओं को और प्रत्येक देशवासी को तैयार रहना चाहिए। बच्चों के विचारों में बड़ों सी परिपक्वता और वर्तमान हालतों पर उनकी जागरूकता को स्पष्ट झलक रही थी।
शिविर का आज अंतिम दिन था और अनेक बच्चों ने जो पहले दिन सहमे सहमे और संकुचित नजर आ रहे थे आज खुलकर मंच पर आकर अपनी बात कही और 3 दिनों के अपने अनुभव सबके साथ साझा किए। सभी बच्चे यहां के माहौल से, कार्यकर्ताओं के व्यवहार से, यहां होने वाली एक्टिविटीज से भोजन से और हर व्यवस्था से बड़े खुश नजर आए और उन्होंने कहा कि हमारा यहां से जाने का मन नहीं हो रहा। बच्चों के साथ आए शिक्षक और शिक्षिकाओं ने भी माना कि स्कूल के माहौल से अलग यहां के माहौल में एक अलग ही बाल सुलभ आकर्षण है जहां बच्चे सहज में ही अच्छे संस्कार ग्रहण कर लेते हैं।


शिविर के दौरान व्यवहारगत बदलाव के उदाहरण सामने आए और ऐसे बच्चों को अंतिम सत्र में मंच पर बुलाकर प्रोत्साहित किया गया। इनमें एक छोटी सी बच्ची कृष्णा शामिल है जो बिना किसी के कहे अपने मन से बिखरे हुए जूतों को पंक्तिबद्ध करते हुए नजर आई थी। इसी के साथ दुर्गेश मेवाड़ा, योगेश रेगर, जयपालसिंह, युवराराजसिंह, गोविन्द जाट, आदिल रज्जा, कोमल और प्रवीण मेघवाल को जिन्होंने परिसर में लगे परिंदों को साफ कर उन्हें पानी से भरा था एवं परिसर में चल रहे काम में मजदूरों के साथ मिलकर अपने मन से उन्हें सहयोग किया था को भी मंच बुलाकर सम्मानित किया गया। जब इन उदाहरणों को सभी बच्चों के साथ साझा किया गया तो हर बच्चा इस जज्बे को तालियों की गड़गड़ाहट से सलाम करता हुआ नजर आया।
3 दिनों के शिविर में बच्चे बाल पुस्तकालय, विज्ञान कक्ष, अणुव्रत चित्र दीर्घा, महान बालक कक्ष, संग्रहालय, गुड़ियाघर, विश्व दर्शन दीर्घा जैसी अनेक प्रवृत्तियों में शामिल हुए। चित्र प्रदर्शनी पर आधारित प्रश्नोत्तरी का जवाब बच्चों की एकाग्रता को प्रतिबिंबित कर रहा था। अलग-अलग समूह में हुई इस प्रतियोगिता में राहुल कुमावत, राजु सरगरा ने प्रथम शंभु खटीक, रवि खारोल ने द्वितीय और रोहित प्रजापत, पवन रावत ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। प्रतिदिन डायरी लेखन बच्चों के लिए एक नया अनुभव था और अनेक बच्चों ने इसे अपनी आदत बनाने का संकल्प भी व्यक्त किया। डायरी लेखन में नरेश मेघवाल प्रथम रविना गुर्जर द्वितीय व ध्वनि टेलर तृतीय स्थान प्राप्त किया।
बच्चों और शिक्षकों के अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि 3 दिनों का यह आवासीय बालोदय शिविर बच्चों के जीवन निर्माण में एक महत्वपूर्ण बिंदु साबित हुआ। बच्चों में अच्छाई व बुराई के बीच अंतर करने का एक स्पष्ट नजरिया विकसित हुआ। पहले दिन बच्चों से पूछा गया था कि क्या कोई ऐसा बच्चा है जो बड़ा होकर बुरा व्यक्ति बनना चाहता हो। सभी बच्चों के उत्तर से यह स्पष्ट था कि ऐसा कोई नहीं चाहता न ही किसी के माता पिता व शिक्षक ऐसा चाहते। फिर बच्चों से पूछा गया कि जब कोई बुरा बनना नहीं चाहता तो फिर दुनिया में इतने बुरे लोग क्यों होते हैं? बच्चे इस बात को समझ रहे थे कि चाहने और होने में क्या अंतर होता है। जो चाहते हैं वह बनने के लिए किस रास्ते को अपनाना और उस पर चलना आवश्यक होता है। इस रास्ते की समझ और उसकी पहचान इन 3 दिनों में बच्चे एक बाल मनोनुकूल माहौल में कर सके हैं यह शिविर से जाते हुए बच्चों के चेहरे पर स्पष्ट झलक रहा था।
शिविर में विभिन्न सत्रों को अणुविभा के अध्यक्ष संचय जैन, शिविर प्रभारी साबिर शुक्रिया, बालोदय कार्यकर्ता कमल सांचीहर, रूखसाना, महेन्द्र गुर्जर, देवेन्द्रकुमार, संगीता जैन, डा. विमल कावड़िया, डॉ. सीमा कावड़िया, उमर मोहम्मद, डा. विनिता पालीवाल का मार्गदर्षन प्राप्त हुआ। शिविर आयोजन में विमल जैन, प्रभा सनाढ्य, दक्षा जाटव आदि का विशेष योगदान रहा। समापन सत्र में सुरेष कावड़िया, डॉ. राकेश तैलंग, अशोक डूंगरवाल का उपस्थिति ने सभी प्रेरित किया।

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